मानसून में बिल से निकले
सांपनाथ हैं सारे।
कभी शेर जो बनते थे
चूहे बने बेचारे।
संभल-संभलकर कदम बढ़ाते,
डर अपने ही यारों से।
ओहदे खुद ही दूर हो रहे
ऊंचे ओहदेदारों से।
रविवार, 4 जुलाई 2010
क्षणजा-1
सदस्यता लें
संदेश (Atom)
एक नया ब्लाग लिखने लगा हूं। थोड़ी पीड़ा, थोड़ी मौज। प्यासे जीवन की क्षण-क्षण खोज। कहीं तो थाह मिलेगी, नदिया की धार मिलेगी। न कुछ मिला, तो अपनो के स्नेह की मार मिलेगी।
मानसून में बिल से निकले
सांपनाथ हैं सारे।
कभी शेर जो बनते थे
चूहे बने बेचारे।
संभल-संभलकर कदम बढ़ाते,
डर अपने ही यारों से।
ओहदे खुद ही दूर हो रहे
ऊंचे ओहदेदारों से।