मानसून में बिल से निकले
सांपनाथ हैं सारे।
कभी शेर जो बनते थे
चूहे बने बेचारे।
संभल-संभलकर कदम बढ़ाते,
डर अपने ही यारों से।
ओहदे खुद ही दूर हो रहे
ऊंचे ओहदेदारों से।
रविवार, 4 जुलाई 2010
क्षणजा-1
बुधवार, 28 अप्रैल 2010
शोकगीत
ऐ गीत,
उनसे जा कहो
यों हृदय
मेरा न देखें
चंचला संध्या न देखें
सहमा हुआ
सवेरा न देखें
प्रीति के प्रारंभ में
सम्बंध सारे जोड़ लें
किंतु, इस सम्बंध की
भावना के छंद की
आज ही आयु न पूछें
घाव का घेरा न देखें।
प्रणय की हर वेदना
यों भले ही क्रूर है
किंतु, उनके प्रेम की
हर क्रूरता मंजूर है
उनके समीप में
साथ में
मैं चाहता हर घात उनका
अपने कोमल हाथ में
उनसे कहो, ऐ गीत
वो भावभर मेरा न देखें
सौन्दर्य मुझमें खूब है
विरह से झुलसा हुआ
वो मेरा चेहरा न देखें।
उनसे जा कहो
यों हृदय
मेरा न देखें
चंचला संध्या न देखें
सहमा हुआ
सवेरा न देखें
प्रीति के प्रारंभ में
सम्बंध सारे जोड़ लें
किंतु, इस सम्बंध की
भावना के छंद की
आज ही आयु न पूछें
घाव का घेरा न देखें।
प्रणय की हर वेदना
यों भले ही क्रूर है
किंतु, उनके प्रेम की
हर क्रूरता मंजूर है
उनके समीप में
साथ में
मैं चाहता हर घात उनका
अपने कोमल हाथ में
उनसे कहो, ऐ गीत
वो भावभर मेरा न देखें
सौन्दर्य मुझमें खूब है
विरह से झुलसा हुआ
वो मेरा चेहरा न देखें।
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