मानसून में बिल से निकले
सांपनाथ हैं सारे।
कभी शेर जो बनते थे
चूहे बने बेचारे।
संभल-संभलकर कदम बढ़ाते,
डर अपने ही यारों से।
ओहदे खुद ही दूर हो रहे
ऊंचे ओहदेदारों से।
सदस्यता लें
टिप्पणियाँ भेजें (Atom)
एक नया ब्लाग लिखने लगा हूं। थोड़ी पीड़ा, थोड़ी मौज। प्यासे जीवन की क्षण-क्षण खोज। कहीं तो थाह मिलेगी, नदिया की धार मिलेगी। न कुछ मिला, तो अपनो के स्नेह की मार मिलेगी।
haha...shi kaha hai
जवाब देंहटाएंbahut badiya..
जवाब देंहटाएंBanned Area News : Strong encryption of wireless technology not unique: BlackBerry
sahi kaha.kam likhte hain par achha likhte hain.likha kijiye...
जवाब देंहटाएंwaah...............sateek vyang.............
जवाब देंहटाएं